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হিন্দী কবিতা, मोक्ष, मालव्य दास, ৪ৰ্থ বছৰ ৩য় সংখ্যা

 मोक्ष



मैं बुद्ध तो नहीं
फिर...
मोक्ष की अपेक्षा क्यों !

निर्वाण की व्यर्थ कामना से
सदमार्ग की प्राप्ति
फिर बुद्धत्व तक सफ़र
करते भटकता मुर्ख।

अष्टमार्ग पर चलना,
मन्त्रमुग्ध होना,
मेरी कर्म से जुड़ा नहीं...
मोक्ष की प्राप्ति
यथार्थ से परे
हास्यास्पद मात्र है...



मालव्य दास
हिंदी शिक्षक
छमरीया हाईस्कूल
शिक्षाखंड : छमरीया

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