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হিন্দী কবিতা, वसुधा ,अनुवाद:- मालव्य दास, ৬ষ্ঠ বছৰৰ ৩য় সংখ্যা,

 वसुधा 




मेरी रिक्त खेत पर तेरी इतनी दुष्टता

मैं वृक्ष की अपत्य,

संतान मैं पहाड़ों का,

नदियों का...

मेरी स्पर्श मात्र से दग्ध होता

ये अनंत प्रज्वलित...

मैं तेरी नहीं, 

मैं हूँ प्रकृति संतान...


माँ, इस अंधकार की समाप्ति कब होगी ?




मूल : जुबिन गर्ग 

अनुवाद:- मालव्य दास

हिंदी शिक्षक

छयगाँव उच्चतर माध्यमिक विद्यालय

शिक्षाखंड : छयगाँव

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