आस्था का पुल
इस आस्था के पुल के बीच,
मैं देखता हूँ खुद को ही खड़ा ,
एक ओर मोह है, भ्रम भरा विश्वास है
दूसरी तरफ मगर प्रेम का साम्राज्य है ,
शाश्वत नियम ब्रह्माण्ड के यहाँ जगमगाते है ।
था जहाँ से मैं चला वहाँ दुख,
अशांति, खेद है ,
उस ओर किंतु शाश्वत सत्य , शुन्य और मौन है उस ओर से मुझे खिंचाव अनुभव हो रहा
यह देख इस तरफ से मोह ने किंतु
मारा तीर है
आघात प्राप्त हो रहा यह मन और शरीर है
पर इस पुल के उस पार जरूर मुझको जाना है
मोह के हर आघात का लक्ष्य ही शायद मुझे उस ओर पहुँचाना है
इस पुल के मध्य में अभी
मैं पहुँचा हूँ रेंग - रेंगकर ,
बाकी बहुत सा रास्ता मगर अभी भी शेष है ।
मुझे वरदान में धैर्य दो , प्रेम दो ,
मौन दो ।
क्रोध , अहंकार , ग्लानि से मुझे ,
हे जगतमाते ! मुक्त करो ।
अलख ज्योति हर कोश में इस देह की मेरी जले
मन में भी उजाला अलख का रहे
सदा सर्वदा...
उस पार जाना मुझे , बहुत अधीर ये मन है
पहुँचने से पहले मगर कठिन जीवन के परिक्षाओं के प्रश्न है
जो भी न हर प्रश्न का संतोषजनक उत्तर दे सका
पड़ा यही इस पुल के मध्य में किन्तु जन्मों तक रहा
मुझ पर भी हे जगतमाते ! इतनी करुणा करना तुम
पार इस पुल के मुझे इसी जन्म में करना तुम
मैंने स्वयं को तुम्हें अर्पण कर दिया
मेरे अनुभवों को , हास्य और रूदन को,
आश्चर्य और स्वभाव को सब तुम्हारा कर दिया
मैं मात्र साधन हूं यह मुझे स्मरण सदा रहे ,
इतनी कृपा मुझ पर सदा तुम्हारी बनी रहे ।
बबिता हाजरिका डेका
हिंदी शिक्षिका
छयगाँव चम्पकनगर गर्ल्स हाईस्कूल
शिक्षाखंड : छयगाँव


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