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হিন্দী কবিতা, सुख-दुःख से परे, सविता दास सवि, ষষ্ঠ বছৰৰ-৪ৰ্থ সংখ্যা,

 सुख-दुःख से परे




मैं जानती हूं

अपनी सीमाएं

कहां तक झेलना है दुःख 

कहां तक सुख को देना है

महत्व...

या इन्हें जीवन में कोई जगह 

देनी भी है या नहीं 

नहीं रखती अब यादों का,

ग्लानियों का बोझ

मेरे कंधे अब किसी

असमंजस से झुके नहीं रहते

ढूंढती नहीं कोई स्वार्थ से भरा हाथ

जो पकड़ कर मुझे खाई तक ले जाए

मैं जानती हूं, जीवन का वृत्त,

असंख्य घटनाओं का क्रम है

और हर पड़ाव पर एक नए 

अस्तित्व का होता है जन्म 

झटक देती हूं मुझसे जुड़ी

अपेक्षाओं को अब 

बस अपने भीतर वो तेज 

कभी कम ना हो जाएं जो

मुझे जिंदा रखती हैं और

सुख - दुःख से परे भी !



सविता दास सवि

हिंदी शिक्षिका 


तेजपुर,असम

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