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हरिजन समुदाय के उत्कर्ष में गांधीजी की भूमिका | Hindi Article by Kalpana Das


हरिजन समुदाय के उत्कर्ष में गांधीजी की भूमिका

भारतीय स्वतंत्र संग्राम के अग्रदूत, पथ-प्रदर्शक, अहिंसा के पुजारी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी महान व्यक्तित्व, मानवतावादी उदार दृष्टिकोण के कारण जनजीवन में आज भी उतने ही लोकप्रिय है जितने अपने समय में थे, साथ ही उनके दर्शन की प्रासंगिकता वर्तमान और आनेवालें भविष्य के संदर्भ में भी उतनी ही समय सापेक्ष रहेंगे । एक समतामूलक समाज के निर्माण से ही देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं;इस अवधारणा से भलीभाँति परिचित गांधीजी देशवासियों से हमेशा आग्रह करते थे कि सपनों के भारत निर्माण के लिए जाति, वर्ण, धर्म के भेदभाव से बाहर होकर ही समृद्ध एवं विकासशील भारत की परिकल्पना की जा सकती है ।  

हरिजन शब्द का प्रयुक्त उन समुदायों के लिए की जाती है जो समाज द्वारा बहिष्कृत, अछूते, अस्पृश्य,नीच माने जाते हैं । इसका शाब्दिक अर्थ है हरि यानि भगवान या ईश्वर और जन का अर्थ हैं लोग अर्थात ईश्वर के संतान । गांधीजी ने समाज में छाये हुए छुआछूत भावना को समाप्त करने के लिए और सामाजिक पुनर्निर्माण हेतु हरि का अंश अर्थात भगवान का अंश एवं बच्चा मानकर उन समुदायों को 'हरिजन' नाम से संबोधित कर उन्हें समाज में आदर दिये । 

व्यक्ति के ऊपर समाज जीवन का प्रभाव व्यापक रूप से परिलक्षित होते हैं । अस्पृश्य या हरिजन समुदाय समाज जीवन की उपज हैं। वर्णव्यवस्था के विकृत स्वरूप और जाति-पाँति के भेदभाव ने अस्पृश्य को जन्म दिया । ये प्रकृत रूप से अत्यंत अभिशाप स्वरूप है। वैदिक काल से लेकर आज के इक्कीसवीं सदी तक इसके कुप्रभावों से हम मुक्त नहीं हुए हैं । 

गांधीजी ने आजादी की लड़ाई के साथ-साथ समाज में नीच समझे जानेवाले वर्ग की उद्धार हेतु कष्ट उठाया और कुछ हद तक सफल भी रहें । उसने समाज में नीच समझे जाने वाले समुदायों की सामाजिक समता, शिक्षा, सामाजिक वैषम्य, नारी उत्थान आदि के ऊपर ज्यादा महत्व दिये। गांधीजी मानते थे कि जबतक भारत सवर्ण और निम्नवर्ग के रूप में दो टुकड़ों में विभाजित होगा तब तक हिन्दू धर्म का, मानव धर्म का नाश सुनिश्चित है, इसलिए उन्होंने देश की हित के लिए, समूह जन की हित के लिए राष्ट्रीय एकता को महत्व दिए। 

अस्पृश्य, अंत्यज या दलित इन शब्दों को गांधीजी हमेशा हिंदू धर्म के माथे पर लगा हुआ कलंक मानते थे। गांधीजी के नेतृत्व में हरिजन आंदोलन ने देशव्यापी प्रभाव फैलाया। जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनल्ड ने अपना सांप्रदायिक निर्णय देते हुए दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन को मान्यता दिया था, तब इस निर्णय के विरोध में सन १९३२ में गांधीजी आमरण अनशन का निश्चय घोषित कर दिया । परिस्थिति की भयाबहता को लक्ष्य करके कालांतर सबके सहमत से एक निर्णीत समझौते पर हस्ताक्षर कर ‘Poona pact’ ने दलित वर्गों के लिए ब्रिटिश भारत के अंतर्गत आनेवालें राज्य और संयुक्त प्रांत की विधान सभाओं में कुल मिलाकर १४८ स्थान सुरक्षित 

कर दिये गए जबकि प्रधानमंत्री के निर्णय में केवल ७१ स्थान ही दिये गए थे । प्रधानमंत्री ने जो सांप्रदायिक निर्णय दिया था उसमें से दलित वर्गों के पृथक निर्वाचन का भाग निकाल दिया । 

गांधीजी हरिजनों के उद्धार का कार्य समस्त हिंदू धर्म के लोगों की, समाज संशोधकों की जिम्मेदारी मानते थे और उनका मानना था कि जब तक समाज से अस्पृश्य की जड़ ख़त्म नहीं होंगे,  इसका उन्मूलन नहीं होंगे, तब तक देश चैन की जिंदगी नहीं जी पाएंगे, मुक्त नहीं हो पायेंगे | उसने देश से अस्पृश्यता को दूर करने हेतु सारे भारत का दौरा किया, लोगों को संदेश दिया । हजारों, लाखों भारतीय गांधीजी की भाषण से प्रेरित हुए हरिजनों के प्रति सवर्ण हिंदूओं के विरोध एवं छुआछूत की भावना कम होने लगे और एक दूसरे को दिल से अपनाने लगे। समाज में हरिजनों को अपनी वंचित अधिकार की प्राप्ति होने लगे, जिससे नीच समझे जानेवाले समुदाय की खोयी हुई स्वाभिमान जागृत हुआ । 

अत: हम कह सकते हैं कि गांधीजी ने अपने समय में अस्पृश्य निवारण हेतु जो कार्य किया वह वाकई सराहनीय हैं । समतामूलक समाज के निर्माण में व्यवस्था की संतुलन होना आवश्यक हैं, गांधीजी इस संदेश को देश भर में दिया । उच्च-नीच के भेदभाव से मुक्त होकर ही अस्पृश्यता का उन्मूलन हो सकता हैं।  आज  इक्कीसवीं सदी के आधुनिक युग में भी हम छुआछूत जैसी भावनाओं से पूर्णरूप से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, ये हमारे लिए, जाति के लिए, समाज के लिए, अपनी अस्मिता के लिए दुखद और शर्म की बात हैं। इसका निवारण हम सब भारतीय की कर्तव्य और ज़िम्मेदारी हैं । 

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श्रीमती कल्पना दास

सह: शिक्षयित्री, छयगाँव आंचलिक मध्य इंराजी विद्यालय

छयगाँव शिक्षाखंड

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