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हिंदी दिवस तथा राष्ट्रभाषा की प्रासंगिकता | Hindi Article by Malabya Das

 

हिंदी दिवस तथा राष्ट्रभाषा की प्रासंगिकता 

 हिंदी दिवस तथा राष्ट्रभाषा की प्रासंगिकता

“राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा जैसा है।” ---महात्मा गांधी


राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी का विचार था कि हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए। देश की उन्नति के लिए राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना आवश्यक है । स्वतंत्र भारत के संविधान सभा ने सन 1949 ई॰ के 14 सितंबर के दिन देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को सम्पूर्ण भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था । संविधान सभा में 12 सितंबर के दिन हिंदी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा और इस प्रस्ताव को सभा ने दो दिन बाद अर्थात 14 सितंबर को सर्वसम्मति से पारित किया । इस महत्वपूर्ण निर्णय को देशभर में गति देने के लिए तथा हिंदी भाषा को हर क्षेत्र में प्रसार व प्रचारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के आग्रह पर सन 1953 ई॰ से पूरे भारतवर्ष में 14 सितंबर के दिन को प्रत्येक वर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है । भारतीय संविधान के 343(1) अनुच्छेद पर हिंदी को संघ की राजभाषा (Official Language of Union) के रूप में स्पष्ट उल्लेख है । हिंदी को हम भारत की राष्ट्रभाषा भी कहते है और यह पदवी भारत की जनगन ने दी हैं । भारत की स्वतंत्रता आंदोलन के समय पारस्परिक सम्पर्क हेतु हिंदी भाषा को राष्ट्र की भाषा के रूप में लोगों ने स्वीकार कर लिया था। तभी से हिंदी जनमानस की भाषा बनी । सम्पूर्ण देश को एक सूत्र में बांधने का काम हिंदी ने किया । हिंदी की व्यापकता को देखकर स्वामी दयानंद सरस्वतीजी ने कहा था कि हिंदी के जरिए ही सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है । वास्तव में हिंदी अनेक भाषाओं का समूह हैं | अबधी, मैथिली, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, मगही, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी, उर्दू आदि कई भाषाएँ और बोलियाँ हिंदी के अंतर्गत हैं। आज हम हिंदी भाषा या राष्ट्रभाषा के नाम से जिस भाषा का परिचय दे रहे है, वह देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली नागरी भाषा है, जिसे अब व्यापक रूप से हिंदी कहा जाने लगा है और जो भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है ।


हिंदी भारत में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जानेवाली भाषा है। सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी की लोकप्रियता दिन व दिन बढ़ रही है । अहिंदीभाषी प्रदेशों में हिंदी के प्रसार व प्रचार के लिए कई राष्ट्रभाषा प्रचार समिति कार्यरत है। असम में सन 1938 ई॰ को ही भारत रत्न गोपीनाथ बरदलैजी के नेतृत्व में असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हुई थी। समिति अपने प्रदेश में हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा के लिए निरंतर काम कर रहा है। असम के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली हिंदी पाठ्यपुस्तकें असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ही संपादित होता हैं । वैज्ञानिक तथा व्यवहारिक दृष्टि से हिंदी भाषा बहुत ही सरल माना जाता है । साधारण वर्ग से लेकर शिक्षित वर्ग तक सभी हिंदी को आसानी से बोल या समझ लेते हैं। शिक्षा, व्यापार आदि हर क्षेत्र में लोग सम्पर्क अथवा साहित्यिक भाषा के रूप में हिंदी को ही प्रयोग करते हैं । हिंदी की सहजता और सरल शैली के कारण लोग बेझिझक हिंदी में बातचीत कर लेते है। राष्ट्रभाषा हिन्दी की विशेषता है कि यह आम लोगों के दिलों को जोड़ता हैं ।

          हिंदी दिवस के उपलक्ष में भारत सरकार के अंतर्गत विभिन्न कार्यालय, केंद्रीय संस्थान, विश्वविद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय आदि में हर साल 14 सितंबर से लेकर पंद्रह दिन तक हिंदी पखवाड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जाता हैं। पखवाड़ा के अंतर्गत हिंदी के अनेक प्रतियोगितायें, संगोष्ठी आदि आयोजित किया जाता हैं, जिससे हिंदी भाषा की गरिमा में वृद्धि हो रही है। हिंदी की विशाल साहित्य से परिचित कराने के लिए अहिंदीभाषी प्रदेशों में भी इस तरह की पखवाड़ा आयोजित करना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है । असम के विद्यालयों में भी इस तरह की कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सरकार तथा अन्य हिंदी सेवी संस्थान प्रोत्साहित कर सकते हैं । इससे राष्ट्रभाषा की सुंदरता निश्चित रूप से वृद्धि होगी ।


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मालव्य दास

हिंदी शिक्षक, छमरीया हाईस्कूल

शिक्षाखंड : छमरीया, कामरूप





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