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विशेष लेख

स्कूली शिक्षा की वर्तमान स्थिति को सुधारने में शिक्षकों की भूमिका 

आज का छात्र कल का नागरिक है । कल के इस नागरिक का निर्माता शिक्षक है । प्राचीन काल से ही शिक्षक और छात्रों का संबंध बहुत गहरा रहा है । भारतीय समाज व्यवस्था में शिक्षकों को बहुत ही ऊँचा दर्जा दिया जाता है । समय के अनुसार सारी व्यवस्थाओं के साथ साथ शिक्षा व्यवस्था में भी काफी बदलाव आया है। प्राचीन काल का टोल या आश्रम बदलकर पाठशाला या विद्यालय बन गया है । वही गुरु-शिष्य का पवित्र बंधन शिक्षक और छात्र का बंधन बन गया है । शिक्षा व्यवस्था से लेकर विद्यालय भवन तक बहुत बदलाव आया है । इन बदलाव के बावजूद भी,  अब भी छात्रों का मुख्य काम ज्ञान प्राप्ति ही हैं | लेकिन बदलते परिवेश ने विद्यालय की स्थितियों में भी ढेर सारी समस्याओं का उजागर किया है । इस लेख में हम मूलत: स्कूली शिक्षा की वर्तमान स्थिति  में शिक्षकों की भूमिका पर चर्चा करेंगे । मूल विषय पर चर्चा से पहले हम यह उल्लेख करना पसंद करेंगे कि यद्यपि स्कूली शिक्षा बोलने से आज नर्चरी से लेकर बारहवीं तक माना जाता है,  लेकिन  इस लेख में हम प्राथमिक पर्याय से लेकर ही चर्चा करने की कोशिश करेंगे |      
स्कूली शिक्षा  की वर्तमान स्थिति काफ़ी नाजुक और दयनीय है । खासकर सरकारी विद्यालयों में छात्रों की कमी बहुत चिंता का विषय है । राजकोष से हर महीने करोड़ों का व्यय तो हो रहा है मगर उसके मुताबिक परिणाम हमें नहीं मिल रहे  हैं । प्राथमिक पर्याय से लेकर माध्यमिक पर्याय तक अगर हम ध्यान से देखे तो हम महसूस करेंगे कि सरकारी विद्यालय के ज्यादातर विद्यार्थी गरीब परिवार के हैं । किसान, मजदूर भाई बहनों के बच्चे अगर 80% हैं तो बाकी के 20% या तो निम्न मध्यवित्त हैं या फिर उच्च मध्यवित्त हैं । बहुत सारे विद्यार्थी पढ़ाई छोड़कर या तो मजदूर बन गए हैं या फिर यू हीं इधर-उधर भटकने लगे हैं । यह हमारे देश के लिए काफी चिंता का विषय रहा है। यानि कि सरकारी विद्यालय  की  शिक्षा व्यवस्था ख़राब रही तो पूरे देश के गरीबों को सही शिक्षा नहीं मिलेगी । जब तक किसान और मजदूरों की उन्नति नहीं होंगी तब तक देश की उन्नति का स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा । इसलिए देश के सही निर्माता शिक्षकों को शिक्षा व्यवस्था की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कदम जरूर उठाना हैं ।
    अगर आपके घर मेहमान न आये तो आपको समझना चाहिए कि मेहमाननवाजी में जरूर कुछ कमियाँ हैं या तो लाड़ प्यार की कमी है या फिर खाने पीने की सही व्यवस्था नहीं है । ठीक उसी प्रकार आपके विद्यालय में भी अगर छात्र ना हो तो आपको भी समझना हैं कि आपके विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था पर भी छात्र या अभिभावक खुश नहीं है ।
    आज की तारीख में लगभग हर विद्यालय में कुछ समस्याएँ सामने आने लगी हैं । जैसे कि  शिक्षक और छात्रों की संबंध में बिगराव, छात्रों की अमनोयोगिता, श्रृंखला और व्यवहार पर ध्यान न देना, कक्षा के अनुपात में शिक्षकों की कमी । वर्तमान अवस्था को सुधारने के लिए शिक्षक कुछ कदम अवश्य उठा सकते है । इन कदमों को हम नीचे ऐसे चर्चा कर सकते हैं--

निम्न प्राथमिक स्तर के शिक्षक : 
निम्न प्राथमिक स्तर के शिक्षक छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं । उनके ऊँगली पकड़कर छात्र पढ़ाई की दुनिया में कदम आगे बढ़ाते हैं । इसलिए निम्न प्राथमिक स्तर के शिक्षकों को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना ज़रूरी हैं---
1) सही समय पर स्कूल आने की और छोड़ने  की आदत डाल दें ।
2) विद्यालय की साफ सफाई पर सबसे ज्यादा ध्यान दें । 
3) सही समय पर प्रातः सभा शुरू करें और विद्यार्थी की स्वस्थता, स्वच्छता और श्रृंखला पर ध्यान दें ।
4) आनंददायक शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करें । सही वैज्ञानिक तकनीकों का उचित उपयोग करें, पढ़ाना छोड़कर पढ़ने का परिवेश बनाने पर ज्यादा ध्यान दें ।
5) प्रोत्साहन और पुरस्कार नीति का सही उपयोग करें ।
6) श्रेणीकार्य और गृहकार्य में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करें ।
7) अभिभावक सम्मेलन का आयोजन वर्ष में तीन-चार बार ज़रूर आयोजित करें ।
8) बच्चों के अभिभावक के साथ ज़रूरत पड़ने पर अकेले में भी बात कर लें ।
9) श्रृंखला बनाये रखने के लिए ज़रूरत पड़ने पर आँखों में क्रोध दिखाते हुए भी दिल में स्नेह बनाये रखना जरुरी हैं ।
10) प्यार के साथ साथ शासन पर भी ध्यान देना ज़रूरी है ।
11) साहित्य और क्रीड़ा प्रतियोगिता का आयोजन करना चाहिए ।
12) छात्रों के सर्वांगीण विकाश के लिए योगा और नृत्य की भी पाठदान करना चाहिए....
अब आते हैं उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के शिक्षकों के कुछ दायित्व...
         वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के अनुसार छठीं कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक उच्च प्राथमिक और नौवीं से  बारहवीं कक्षा तक माध्यमिक स्तर में आता है । इस स्तर में छात्रों के किशोर काल शुरू हो जाते हैं । हाँ, ज्यादातर लड़कियों का यह स्तर सातवीं,आठवीं कक्षा से ही शुरू हो जाते हैं, इसलिए  यह समय शिक्षकों के लिए भी काफी चुनौतीपूर्ण होते हैं । यह काल छात्रों के लिए भी बड़े तनाव और विकाश का समय है । इसी समय में ही छात्र अपना भविष्य निर्माण करते हैं या अपना भविष्य बर्बाद करते हैं । इसलिए इस काल में छात्रों पर काफी ध्यान देना ज़रूरी हैं । वरना स्कूल में अनुशासन बनाये रखने की समस्या, झगड़े की वृद्धि, छेडछाड़ की बढ़ौती, भेदभाव की भावना की वृद्धि जैसी अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ सकता है । अतः बता सकते हैं कि  स्कूली परिवार के मूल छात्रों के शारीरिक व मानसिक विकाश को मजबूत बनाकर ही स्कूल की स्थिति को मजबूत बनाये जा सकते हैं । यहाँ हम ऐसी कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर चर्चा करेंगे... 
1) उच्च प्राथमिक विद्यालय (M.E.S) और माध्यमिक विद्यालय (H.S) के शिक्षकों को छात्रों से पहले स्कूल आने की और बाद में जाने की आदतें डाल लेनी चाहिए ।
2) छात्रों के शारीरिक व मानसिक विकास को मजबूत करने के लिए प्रातःवंदन के समय ही योग का अभ्यास करना चाहिए । इस प्रातःवंदन के समय ही छात्रों के स्वरचित कविता, कहानी आदि को पाठ करने का सुविधा प्रदान करना चाहिए । छात्रों के अच्छे कामों की प्रशंसा करना चाहिए ।जिससे उनके व्यक्तित्व का विकाश हो सके ।
3 ) इस उम्र के बच्चों की भावनाओं का कदर करना चाहिए । उन्हें सज़ा देते वक्त ध्यान रखना चाहिए कि उसे मानसिक चोट ना पहुँचे । जहाँ तक संभव हो प्यार से और समझा बुझाकर ही सारी समस्याओं का हल निकल लेना चाहिए ।
4) उनके मन में दायित्व का भाव बढ़ाने के लिए कुछ दायित्व अर्पण करना चाहिए । नेतृत्व प्रदान का कौशल भी स्कूल में ही दे देना चाहिए ।दायित्व देने के बाद उन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए । उनको दिग्दर्शन करने का काम शिक्षकों को ही करना हैं ।
5) इस उम्र के छात्रों को सीमा में रहकर यौन शिक्षा भी प्रदान करना चाहिए । यौन शिक्षा को कुछ पाशचात्य देशों की शिक्षा में पाठ्यक्रम में शामिल भी कर लिया है ।
6) कभी कभी बड़े बड़े वैज्ञानिकों,  लेखकों, चित्रकारों, महान व्यक्तियों,  महापुरुषों की जीवनी बताकर उनके मन में भी ऐसी भावना का उदय करने की कोशिश करनी चाहिए । याद रखें  कि अगर आपके ऐसे श्रेणी से एक भी विद्यार्थी प्रभावित हुए, तो आप  कामयाव हुए ।
7) जिस प्रकार हाथी कितना वजन उठा सकता हैं, उसका अंदाजा महौत को होता है, ठीक उसी प्रकार छात्र कितना वजन उठा पायेगा, उसका अंदाजा भी शिक्षकों का रहना चाहिए ।उसीके मुताबिक उनका पाठदान होना चाहिए ।
8) इस उम्र के छात्रों को हार और जीत का सामना करने के लिए प्रस्तुत कर लेना चाहिए ताकि जिंदगी की समस्याओं से वे जूझ सके ।
         इस तरह छात्रों को प्रस्तुत करने से स्कूल की स्थितियों में कुछ न कुछ बदलाव की उम्मीद हम अवश्य ही कर सकते हैं । 
   अंत में हम यह अंतःकरण से मानते हैं कि ऊपर जितनी सारी बातें कही गयीं हैं, उसके अलावा भी अनेक कार्य हमारे शिक्षक कर रहे हैं । यहाँ तो कुछ उपायों पर चर्चा हैं । हाँ ये सारे काम करना मुश्किल ज़रूर हैं । मगर असंभव नहीं हैं । शिक्षक अगर दिल से चाहे तो योजना के साथ अवश्य ही ये काम कर सकते हैं ।
      हमें हमेशा यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि जिस प्रकार उपवन फूल के बिना सूना हैं, उसी प्रकार छात्रों के बिना भी विद्यालय खाली हैं । छात्र जितने रंग बिरंगी होंगे,  विद्यालय भी उतने ही सुन्दर और आकर्षक होंगे ।  जब छात्र मुस्करायेंगे तब स्कूल भी खिल उठेंगे । स्कूल अच्छा रहा तो छात्र अच्छा होगा । छात्र अच्छा हुआ तो उस देश का भविष्य भी उज्ज्वल होगा । तब सारा शिक्षक समाज सर ऊंचा करके जी पायेगा । शिक्षकों का फिर से जयजयकार होगा ।


मुकुट कलिता 
दमरंग बरजुली एम इ स्कूल 
शिक्षा खंड : बोको, कामरुप










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