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হিন্দী প্ৰবন্ধ, 'भूपेन हाजरिका के कला कृतियों में भारतीयता' - एक आलोचनात्मक विवेचन , डॉ. कृष्ण कांत मालाकार, ৪ৰ্থ বছৰ ২য় সংখ্যা,

 'भूपेन हाजरिका के कला कृतियों में भारतीयता' - एक आलोचनात्मक विवेचन 

                           


भारतवर्ष के सफल कलाकारों में डॉ. भूपेन हाजरिका एक परिचित नाम है। उन्होंने गद्य साहित्य, गीति साहित्य, शिशु साहित्य , चित्र-नाट्य से लेकर आलोचना साहित्य ,जीवनी साहित्य तक अपना साहित्यिक महल बड़ा बनाया । संगीत और चलचित्रों के दुनिया में अब हाजरिका एक चिरदिव्यमान ज्योति है । असमीया ,बांग्ला और हिन्दी भाषा के अलावा भी हाजरिकाजी ने भोजपूरी और कारवि भाषा में भी चलचित्र का काम किया है । प्रधानत: इनके साहित्य और संगीत की साधना में भारतीयता है । हाजरिका भारतीय संस्कृति का एक सफल जननेता है । भूपेन हाजरिका ने अपने कला साधना के द्वारा भारतीय संस्कृति एंव समाज की अन्तध्वनि की समानताएँ स्पष्ट रुप से दिखाया है । भारतीय समाज में जाति –जनजातियों के बीच एक समन्वय की भावना हाजरिका अपने साहित्य संस्कृति में अपने संगीत साधना के जरिए अपने साहित्यानूभुति के द्वारा बहुत ही सुन्दर रुप से प्रस्तुत किया है । भारतवर्ष में अनेक भाषा–भाषी के लोग है, देशकाल या वातावरण भी अलग-अलग है, परन्तु साहित्यानूभुति और संगीतानूभुति का स्त्रोत या प्रवाह एक है। इसका बहुत बड़ा सफल उदाहरण है डाँ.भूपेन हजारिका । वह अपने साहित्यानूभुति या संगीतानुभूति में असमीया, बंगला और हिन्दी के साथ साथ भारतवर्ष के अनेक जाति–जनजातियों के स्थानीय भाषा एंव बोलियों के उपर  काम किया । अनेक भाषा एंव देशकाल का परिचय उनके साहित्यानूभुति एंव काव्यानूभुति में प्राप्त है। जिसकी समन्वय क्षेत्रों में भारतीयता का बीज लगा हुआ है ।
भूपेन हजारिका का जन्म सन 1926 का 8 सितंबर के दिन असम के शदिया में हुआ था । पिता का नाम था “नीलकांत हजारिका” और माता “शांति प्रिया हाजरिका” थी । हजारिका अपने दस भाई –बहनों में सबसे बड़े थे । बचपन से अपने माँ से संगीत की चर्चा की । इनका बचपन गुवाहाटी में बीता । जब वह दस साल के थे तब वह अपने पहली गान गाए और वह गान विख्यात फिल्म मेकर ज्योतिप्रसाद अग्रवाला को सुनने मिला था । अग्रवाला ने उनकी आवाज सुनी और उन्हें वह बहुत पसंद आए और 1936 में हाजरिका अपना पहला गान कोलकाता में रिकोर्ड किया । इसके बाद हाजरिका ज्योतिप्रसाद की फिल्म ‘इन्द्रमालती’ में भी दो गान गाए। इस समय उनका उम्र 13 साल का था । यही से उनके गीतकार, कंपोजर और लिरिसिस्ट बनने का सफर शुरु हो गया था ।1942 में वह आर्ट से इंटर की पढ़ाई पुरी की । इसके बाद बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय से उन्होने एम.ए. किया । पढ़ाई पुरी होने के बाद हजारिका ने गुवाहाटी में आँल इंडिया रेडियों में गाना शुरु कर दिया । इसके साथ हजारिका बंगाली गानों को हिन्दी में अनुवाद कर उसे अपनी आवाज देते थे । भाषा के क्षेत्र में हाजरिका को कई भाषाओं का ज्ञान था । असमीया, बंगला , उरिया, मलयालम और हिन्दी ,अंग्रेजी तो है ही साथ साथ बहुत ही स्थानीय उपभाषाओं का ज्ञान और अच्छे जानकारी थे । भारतीय बहुत उपभाषाओं में हजारिका ने गाने गाए । कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनकी मूलाकात प्रियम्वदा पटेल से हुई । दोनों में प्यार हुआ और यु.एस. में ही सन 1950 में दोनों ने शादी कर ली । 1952 में उनका बेटा तेज हजारिका हुआ । 1953 में हजारिका अपने परिवार के साथ भारत लौट आए लेकिन दोनों ज्यादा समय तक साथ नहीं रह पाए । भारत आकर हाजरिका ने गुवाहाटी विश्वविद्यालय में शिक्षक की नौकरी भी की परन्तु शिक्षक की नौकरी वह नहीं कर पाए और इस्तीफा दे दिया । पैसों की तंगी की वजह से उनकी पत्नी प्रियम्वदा ने उन्हे छोड़ दिया । इसके बाद हाजरिका ने संगीत को ही अपना साथी बना लिया । उन्होंने रुदाली , मिलगई मंजिल मूझे, साज, दरमिया, गजगामिनी, दमन और क्यों जैसी सूपरहित फिल्मों में गीत दिए । हाजरिका ने अपने जीवन में 1000 से ज्यादा गाने लिखे और सुर भी दिए । ख्याति प्राप्त किताबें 15 माने गए । इसके अलावा उन्होंने स्टार टी,वी.पर आनेवाले गान को प्रोड्युस भी किया था । 
सम्मान –
1975 में संगीत क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय सम्मान मिला ।
1977 मे पद्मश्री सम्मान से सम्मानित ।
1992 में सिनेमा जगत के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया गया । 2009 में असम रत्न सम्मान मिला ।
2008 में संगीत नाटक अकादमी मिला ।
2011 मूक्ति योद्धा पदक  ।
अंत 2011 को 5 नवम्बर के दिन मुम्बई में उनका देहावसान हुआ और मरणोपरांत 2012 में पद्म भूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया गया और अंत में 2019-भारत रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया है । 
प्राचीन काल में संगीत और काव्य का जो अध्ययन कार्य हुआ था इसके आधार पर यह कहाँ प्रथम प्रारंभ हुआ कह देना टेढ़ी खीर है । महाकवि कालिदास में उत्तर भारत के प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के प्रायः सभी ग्रंथों और प्रसिद्ध टीकाओं के अंतर्गत विभिन्न प्रसंगों में तुलनात्मक सन्दर्भ प्रचुर मात्रा में सहज ही उपलब्ध है। आनन्दवर्धन और कुन्तक ने जहाँ संस्कृत और प्राकृत के प्रसिद्ध कवियों और नाटककारों के वास्तुकौशल –सम्बन्धी कलात्मक प्रयोगों का सूक्ष्म –गहन अध्ययन  विवेचन किया है । प्रधानतः प्राचीन युग से काव्य साहित्य और संगीत  की एक लम्बी  परम्परा रहा है ।
हाजरिका के कला साधना का महत्व केवल असमीया समाज ,असमीया साहित्य में ही सिमीत नहीं रहा बल्कि विश्व साहित्य को प्रभावित किया है । इसके कला –संस्कृति में जो दार्शनिक चिंताएँ है, ज्ञानात्मक जो रचनाएँ है इन सब में एक आदर्श की अभिव्यक्ति का  सुन्दर रुपायण होती है । इसी में हमें प्रेमचन्द्र की याद होती है , जहां आदर्शोन्मुख  यथार्थ की अभिव्यक्ति है । इसका मुख्य कारण मैंने तीन देखा है –
1. भूपेन हाजरिका के संगीतों की एक मुख्य विशेषता है लोकमंगल की भावना जो प्रेमचन्द्र के थे।
2. भूपेन हजारिका केवल संगीत के क्षेत्रों में ही नहीं चलचित्रों से लेकर आलोचना साहित्य तक ,गद्य, पद्य,जीवनी साहित्य सभी क्षेत्रों में इनकी ख्याति प्राप्त है ।
3. इनके साहित्यिक उपलब्धियाँ और संगीत के कुछ-कुछ गानें हमारे समाज के भविष्य की घोषणा है । उनकी साहित्यानूभुति और संगीतानूभुति की अभिव्यक्ति में केवल विनोदप्रियता ही नहीं, इसमें व्यक्ति और समाज का आत्मसम्बन्ध भी स्थापित है । जैसे-
“मानुहे मानुहर बाबे, यदिहे अकणो नेभावे,
अकणि सहानुभूतिरे ,भाविव कोनेनु कोवा समनीया ।
मानुह यदि हे नहय मानूह ,दानव काहानिओ नहय मानूह
यदि दानव काहानिवा हय मानूह ,लाज पावो कोने नो कोवा समनीया” ।
प्रधानतः हाजरिका की साहित्यिक उपलब्धियाँ भारतीय साहित्य-संस्कृति की उज्जल भविष्य की घोषणा है ।
साहित्य एंव संगीत हमारे  समाज की नये  गति निर्माण करेगा । मुख्यतम बात यह है कि भारतीय काव्य में भारतीय दर्शन , भारतीय समाज, संस्कृति , इतिहास और  भारतीय परम्पारा का अनुसंधान करने के साथ साथ भारतीयता स्पष्ट होनी चाहिए। जिसमें मानवता को मूख्य स्थान मिले और विश्व मानव समाज में भारतीय मानवता का परिचय पहला हो जाए । इस प्रकार के तथ्यों को ध्यान में रखकर प्रस्तुत लेख में मुख्यत तीन परिकल्पना किया गया है –
(क) गीतों की सफल परिकल्पना या रुपायण,
(ख) नये उज्ज्वल ज्योतिर्मय समाज की कल्पना, और 
 ग) देश के साहित्यानुभूति और संगीतानुभूति की उद्दैश्य को पूरा किया जाए, ताकि हमारे भविष्य की स्वप्न साकार हो जाए, स्वप्न ही न रहे । 
साहित्य में साहित्यकार का जीवन दर्शन भी प्रस्फूतित होती है । साहित्यकार खुद व्यक्ति है और व्यक्ति का महत्व किसी न किसी समाज में अनिवार्य है । समाज अलग-अलग होने के बावजुद भी व्यक्ति का चिंतन एक हो सकते है , जो चिंतन या अनुभूति काव्य के रुप में बाहर आती । प्रत्येक काव्य सग्रंह कवि के व्यक्तित्व की देन है । इस काव्याऩुभूति यदि संगीतानुभूति में परिवर्तन किया जाए और  सुर, लय और ताल से प्रसिद्धि प्राप्त हो जाए, तो वह अमर कृति या यश बन सकते है । किसी भी लेख या शोध का कुछ न कुछ लक्ष्य या आदर्श ( OBJECTIVE ) अवश्ये रहता है ।  प्रस्तुत लेख का उद्देश्य निम्नोक्त विचार बिन्दूओं पर ध्यान रखकर किया गया है। जो इस प्रकार है --संगीत में संवेदना और शिल्प के विभिन्न पक्षों का उदघाटन करना  और  साहित्य में इसका यथार्थ रुपांतर की ओर जोर देना। भूपेन हाजरिका के कला की संवेदना और शिल्प के विभिन्न पक्षों का पर्यालोचना और भारतीय समाज एंव साहित्य में इनका यथार्थ रुपायण। भारतीय कला एंव साहित्य-संस्कृति की एक और मुख्य विशेषताएँ है- भारतीयता। जो भारतीयता का प्रभाव हजारिका के साहित्याऩुभूति के पग-पग में है । संगीत और शिल्प-कला में समाज का यथार्थ वर्णन होनी चाहिएँ ,जो इनमें पर्याप्त प्राप्त है । इनके साहित्यिक अनुभूति , जीवन दर्शन ,दार्शनिक चिंतन की अभिव्यक्ति  सभी में भारतीय एकता का ही प्रतिष्ठा है । यही सभी विचार बिन्दुओं का एक आलोचनात्मक विवेचना ही प्रस्तुत प्रकल्प का उद्दैश्य रहा है ।
कला में कलाकार का जीवन-दर्शन अवश्ये प्रस्फूतित होती है, किसी भी कलाकार का भाषा एंव समाज का प्रभाव अपनी साधना में अवश्य रहता है ,परन्तु चिंतन –मनन की खोज में विश्वदृष्टि होनी चाहिएँ। इस क्षेत्रों में हाजरिका के साहित्यानुभूति और संगीतानुभूति दोनों सफल विश्वदृष्टि का रुपायण है। इनका प्रत्येक गीत या काव्य की चिंतन–मनन सम्पूर्ण भारतीय रहा है और दर्शन की खोज में विश्वदृष्टि है। इनके साहित्यानुभूति और संगीतानुभूति दोनों सफल विश्वदृष्टि का रुपायण है। इनका प्रत्येक गीत या काव्यानूभूति में एक दार्शनिक चिंतन की अभिव्यक्ति रहती है। जैसे-“व्यक्ति यदि व्यक्ति केन्द्रीक
समष्टि यदि व्यक्तित्वरहित
तेने शिथिल समाज नाभाङा किय \”
प्रस्तुत संगीतवह आह्वान करते है कि– आदमी यदि व्यक्ति केन्द्रिक होकर समाज को देखे ,वह व्यक्ति से समाज का क्या लाभ होगा?? और इनसे गढ़े समाज तोड़ देना ही ठीक है। जिसे इनके निर्माण का कूफल हमारे देश को प्राप्त न हो जाए, सम्पूर्ण विश्व पग-पग में इनको खोजे और भारतीय समन्वय की वार्ता से विश्वशांति की वार्ता फैला जाए। हजारिका के कला साधना भारतीय विभिन्न वर्गों के जाति-जनजातिओं का चर्चा है। वह खुद विभिन्न अंचलो में गये और विभिन्न अंचलों का यथार्थ रुप अपने साधना में प्रस्फूतित करने का प्रयास करे। मूलतः यही साहित्यकारों की साहित्यानूभूति होनी चाहिएँ और संगीतकारो की संगीतानुभूति। हाजरिका के भाव और विचार से आर्थिक सामाजिक, और उस समय की परिवर्तित समाज के सामाजिक नीति नियम का प्रभाव उनके शिल्प साधना का विषयवस्तु रहा ।जैसे -
“मानवतार पतन देखिअ
निर्लज्य आलख भावे वोआ कियौ
ज्ञानविहिन निरक्षरर खाद्यबिहिन नागरिकर
नेतृत्वबिहिनतात निमात कियौ”
अंत हमें स्पष्ट  होता है कि–भूपेन हजारिका के कला साधना में भारतीयता है । इनके कला की स्त्रोत सम्पूर्ण हिन्दूस्तान के प्रति रहा ,और प्रतिध्वनि अन्तराष्ट्रीय रहे। मेरा प्रतिध्वनि का अर्थ है–सामना करने की शक्ति ।हाजरिका ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों, अंचलों के लोगों के जीवन का यथार्थ को लिया । भारतवर्ष के प्राय जाति –जनजातियों के बीच हाजरिका का साहित्यिक बीज बोया गया । जैसे-
“नाना जाति उपजाति, रहनीया कृष्टि
आकोवाली लौ हौचिल सृष्टि, एइ मोर असम देश
विभेद परिहरि, निज हाते श्रम करि
देशक नगढ़िले, एइ देश हव निःशेष
आरु मनवोर भागि छिगि जाब,
आजिर असमीयाइ निजक नवचाले,
असमते मगनीया हव”।
दूसरी ओर
“पलाशरे रंग कोनेनो सानिले, एइ मिठा सेउज बननीत
आरु तोमार कोमल चाउनित” ।
आज साहित्य –संस्कृति एंव जाति के भेद के नाम पर देश को खंडित करने के कुचक्र चलने की वातावरण बलबती हो रही है। ऐसी परिस्तथितियाँ में हमें इस प्रकार के महान नेता की ओर स्मरण होनी चाहिएँ। इनकी कृतियों पर चर्चा होनी चाहिएँ, साथ-साथ आवश्यक होती है उनकी कृतियों का गुणानुकीर्तन करना । जिसे सामाजिक सामंजस्य और सदभाव की भावना बढ़ती है और देश में भारतीयता की अनुभूति भी बढ़ते जाते है ।
अतः इनके आदर्श और दार्शनिक भावानुभूति से एक नये समाज बने और सम्पूर्ण देश को एक सुत्र में जोड़कर राष्ट्रीय एकता के पवित्र तक्ष्य को साकार कर सकते है।इसको हम हाजरिका के ही शब्दों में इस प्रकार कह सकते है ---“दानवी विभेदक, मानवी प्रेमेरे
करिव एदिन पराजित” ।
इस प्रकार देखा जाय तो हाजरिका एक सफल युगनेता और जननेता है । हमें इनकी अध्ययन से उपलब्ध विचार-बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए । जिससे हमें निम्नलिखित रुप से स्पष्ट कर सकते है -
1. संस्कृति की दृष्टि से हमारे देश में अनेकता है। अनेकता में एकता की प्रतिष्ठा करना हमारे देश की संस्कृति का उद्दैश्य है। इसकी एक सफल यात्रा हाजरिका की कला-कृति है। क्योंकि भारतवर्ष के अनेक धर्म के लोग और भिन्न सम्प्रदाय के लोगों की संस्कृति का परिचय ही इनके संगीतों का विषय रहा ।
2. हाजरिका के साहित्यानुभूति में रोज एक नये खोज या निर्माण की भावना रहती है , जिसे हमारे जीवन मूल्य एंव सामाजिक–सांस्कृतिक संस्कार की एक गति प्रदान करती है। दुसरी ओर समाज को संस्कार, उन्नत और आगे बढ़ने की शक्ति भी प्रदान करता है ।
3. संगीत में स्वर और लय का महत्व सर्वोपरी है । इस क्षेत्रों में हाजरिका का सुर और लय सम्पूर्ण शास्त्रीय है। नादमय उचार के साथ साथ ताल, लय और शास्त्रीय दृष्टि से भरपूर होने के कारण सभी रचनाएँ अमर बने है। साथ साथ मौलिक भी है । 
4. समाज का यथार्थ प्रतिबिम्ब उनके कला-कृतियों में पर्याप्त प्राप्त  है । 
निष्कर्ष के रुप में हम कह सकते हैं कि - कला मानव मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साधन है । साथ ही एक–दुसरे को जोड़ने का माध्यम भी है । यह सिद्धांत का प्रमाण हमें भूपेन हजारिका के कृतित्व में देख सकते है। जिनके संगीत और कृति के यश से हमें पूर्वोत्तर से लेकर केवल भारतवर्ष को ही नहीं  बल्कि सम्पूर्ण विश्व को एक क्षेत्रों में जोड़कर एक अंतराष्ट्रीय एकता के पवित्र लक्ष्य को साकार कर सकते है।अंतराष्ट्रीय समन्वय की खोज में हमें नये संस्कार और नये निर्माण की आवश्यतका होती है, नहीं तो कहीं कहीं कुछ न कुछ परिवर्तन या जोड़ने की आवश्यकता होती है । बल्कि समाज की उन्नति सम्भव नहीं होगा। क्योंकि सफल संस्कृति की सफलता इसी में है जहां संस्कार है। आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी का कहना है कि –“संस्कार सम्पन्न जीवन ही संस्कृति है।" इस दृष्टि से हाजरिका के कला साधना समकालीन भारतीय समाज के सांस्कृतिक ,राजनैतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक  क्षेत्रों में  रोज एक नये विश्वदृष्टि की खोज करती है , जिससे हमें विश्व शांति और अंतराष्ट्रीय समन्वय की भावना प्राप्त होती है । इस प्रकार की संस्कृति से किसी भी देश में सांस्कृतिक सफलता अवश्य होगा , संस्कृति की मर्यदा बढ़ेगी, साहित्य का विकास होगा और साथ ही साथ एकता की नींव निर्माण होगा और साहित्यानूभुति की उन्नति के साथ संगीतानुभूति की सुगंध विश्वशांति की ओर प्रतीत होगा ।
अतः काव्यकृति एंव कलाकृति की असीम संभावनाओं को उजागर करने के साथ भावी नवगीत के उस स्वरुप की ओर भी संकेत करते है जो यथार्थ को स्पर्श करेगें । कविता की सौन्दर्य बढ़ेगी, साहित्य का उन्नति होगा।
अतः संगीत्यानुभूति एंव काव्यानुभूति की प्रेरणा मिलेगी ।
“पैसो की तंगी के चलते पत्नी ने छोड़ा था साथ,
संगीत को साथी बनाकर भूपेन हजारिका ने काटी पूरी जिंदगी” ।


डॉ. कृष्ण कांत मालाकार
नाहरकटीया महाविद्यालय, नाहरकटीया 
(विभागाध्यक्ष) हिन्दी विभाग


सन्दर्भ (REFERENCES)
1 सुरर जिंजिरणी –संग्राहक गोकूल कलिता –प्रकाशक-बि.आर .बुकस्टल-गोहाटी -1पृ-72
2 सुरर जिंजिरणी –सग्राहक गोकूल कलिता –प्रकाशक-बि.आर .बुकस्टल-गोहाटी -1पृ-58
3  सुरर जिंजिरणी –सग्राहक गोकूल कलिता –प्रकाशक-बि.आर .बुकस्टल-गोहाटी -1पृ-73,4 वही –पृ-89, 5,वही पृ-71
4वही पृ-67
5वही पृ-67
6वही पृ-70

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