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হিন্দী প্ৰবন্ধ, सोचने का तरीका, बबिता हजारिका डेका, ৬ষ্ঠ বছৰৰ ২য় সংখ্যা,

 सोचने का तरीका


आज ही बात हो रही थी मित्रमंडली में "और कोई नई ताज़ा खबर" जवाब में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, शैक्षिक, सामाजिक और जाने किन-किन क्षेत्रों से जुड़ी 100-100 खबरों के गुब्बारे मन के आकाश में उड़ने लगे । हर मित्र ने कोई ना कोई गुब्बारा पकड़ रखा था और दूसरों के पकड़े गुब्बारे को अपनी समझ अनुसार एक नया रूप देने का प्रयास कर रहा था । फिर वह दौर भी आया जब सभी अपनी सोच और समझ को चुस्त दुरुस्त और दूसरों की सोच को पस्त हाल ठहरने लगे ।

          दरअसल, तभी मुझे यह लगा कि हमें सही तरीके से सोचना नहीं आता या हमें किसी ने "क्या सोचें" और "कैसे सोचे" यह  सिखाया नहीं । उदाहरण स्वरूप हमारी सोच में सफलता के मायने क्या है ? दिल पर हाथ रखकर जवाब दीजिएगा l क्या अभी-अभी आपके परिचितों की बहु मंजिला आलीशान इमारतें, गाड़ियां, बैंक बैलेंस आदि आपकी आंखों के आगे से तैर कर नहीं निकल गया ? बात कड़वी लगेगी पर हमारी संकुचित सोच में शायद अब सफलता दौलत और शोहरत ही होकर रह गए हैं ।

         हमें एक साल के बिट्टू के पहले-पहल बिना सहारे चलने की कोशिश में सफलता नहीं दिखती । उसके पहले दिन स्कूल जाकर बिना रोए मां से दूर आधा दिन बीताकर घर मुस्कुराते हुए लौटना भी उसकी सफलता नहीं लगी । दो दिन गिर पड़ने के बाद तीसरे दिन बिना गिरे साइकिल चला पाना भी हमने उसकी सफलता नहीं माना । उसके बनाए चित्रों को हर प्रतियोगिता में पहला, दूसरा या तीसरा स्थान मिला पर यह भी कब उसकी सफलता माने गए ।

           बिट्टू को तो हम सफल तब मानते जब नम्बरों की अंधी दौड़ में वह पहले स्थान पर खड़ा मिलता । चाहे इसकी कीमत चुकाने के लिए उसके अंदर का मासूम बालक उसके भीतर का चित्रकार सब स्वाहा हो जाते । फिर स्कूल खत्म होने पर कौन उससे पूछता है कि तुम क्या पढ़ना चाहते हो ? किस ओर चलना चाहते हो ? हमें तो बस अपने अधूरे ख्वाब पूरे करने थे बिट्टू के सहारे । अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ हम फिर बिट्टू के कंधों पर लाद चले और फिर जब वह बाहरी असली कठोर दुनिया के लिए तैयार हुआ तो उसकी योग्यता उसके आंतरिक प्रतिभा और उसके हाथों की कारीगरी में नहीं बल्कि उसकी कमजोर याददाश्त से कमाए नंबरों में ढूंढा जाता है ।

        उसके बाद वैवाहिक जीवन शुरू करने की उम्र में भी उसकी 'मासिक आय' और 'सरकारी नौकरी' उसे अच्छा लड़का या योग्य वर सिद्ध करते हैं उसका सद्चरित्र नहीं ।

          हमारी संकुचित सोच अब हमें दौलत शोहरत ही सफलता का पर्यायवाची बताने लगी है । हमारी सोच सफलता का अर्थ स्वयं ऊपर न चले जाने पर दूसरों को भी नीचे गिरा कर ऊपर जाने ना देना बतलाती है और इस सोच के चलते कितने बिट्टू बर्बाद हो रहे हैं । मानसिक अशांति से जुझ रहे हैं इसका कोई हिसाब नहीं है, क्योंकि कहीं ना कहीं आप और मैं भी वह बिट्टू है और ऐसे हजारों बिट्टू बनाने वाले सफलता के झूठे मायने तय करने वाले भी हम ही तो हैं ।



बबिता हजारिका डेका

हिंदी शिक्षिका

छयगाँव चम्पकनगर गर्ल्स हाईस्कूल

शिक्षाखंड : छयगाँव

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